Monday, September 21, 2015

कूड़े में ज़िन्दगी


कूड़े में ज़िन्दगी


आज जब
उस बूढ़े आदमी को
कूड़े के ढेर से
कुछ !
चुनकर खाते देखा ।

मैं किंकर्तव्यविमूढ़
इंसान और जानवर में
भेद ही न कर पाया ।
उसकी बेचारग़ी 
और लाचारी
ढाँचे जैसे जिस्म और
आँखों से 
बाहर आ रही थी ।
सब कुछ भूलकर
वह खाए और बस
खाए जा रहा था ।

ग़रीबी जो न कराए
यह सामाजिक तर्क है ।
पर हो न हो
यही तो असली नर्क है ।
शायद वह 
इस तथ्य से
अनजान था
कि उसके भी दिन
बदलने वाले हैं ।

अब कोई 
भूखा नहीं रहेगा
न भूखा सोएगा और
न भूखा मरेगा ।
अब खाने के अधिकार से
उनकी भूख मिटेगी ।
हर दिन अब
गर्मा-गर्म थाली जो मिलेगी ।

यह बात और है कि
भोजन खिलाया जाएगा
अथवा दिखाया जाएगा ।
किन्तु इतना ज़रूर है कि
थाली की आशा में इंसान
कुछ दिन और जी जाएगा ।
मुश्किल तो विकट तब होगी
जब खाने वाले चार
और थाली एक होगी ।
ऐसे में माँ खाएगी
या फिर बाप खाएगा ।

ओह !
बच्चों का क्या होगा ?
अन्तत: पूरा कुनबा
भूखा का भूखा रह जाएगा ।
उसकी आंखों के सामने
घनघोर अंधेरा होगा
और वह अपने आप को
ठगा हुआ पाएगा ।

रोएगा पछताएगा
कुछ भी कर नहीं पाएगा ।
आँखें में रोटी के टुकड़े बसाये
फिर से किसी कूड़े के ढेर में
कुछ खोजता नज़र आएगा ।

वक़्त गुजरेगा और
सरकारें बदल जाएंगी
लेकिन वह कूड़े के ढेर में
दफ़न हो जाएगा ।।


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